धरा को बचाएँ, कल को सँवारें

“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्या”
 अर्थात भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।
 यह संदेश देता है कि हमें अपनी माता (पृथ्वी) का शोषण नहीं, बल्कि पोषण करना चाहिए और पर्यावरण का संरक्षण करना हमारा कर्तव्य है।
प्रकृति हमारी माँ है। वह हमें हवा, पानी, भोजन और नैसर्गिक सौंदर्य देती है। लेकिन  आज हम ही उसे बीमार कर रहे हैं!
 प्लास्टिक कचरा, पेड़ों की कटाई, पानी की बर्बादी और गाड़ियों का धुआँ हमारी धरती को रोज़ कमजोर बना रहा है।
वैश्विक स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति आप सभी से छुपी नहीं है,
औद्योगिकरण के कारण आज वैश्विक तापमान  1.2°C बढ़ चुका है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ता चला जा रहा है, और हीटवेव, बाढ़, सूखा जैसी आपदाएँ बार-बार आ रही हैं।
2023-2024 सबसे गर्म वर्ष रिकॉर्ड हुए हैं। अगर हमने अभी कदम नहीं उठाए, तो 2050 तक धरती 2°C से अधिक गर्म हो जाएगी।
*प्रकृति का नैसर्गिक सौंदर्य* — हरे-भरे पेड़, नीला आकाश, कल-कल करती नदियाँ, चहकते पक्षी। यह सुंदरता तभी बनी रहेगी जब हम प्रकृति का संतुलन सही रखेंगे।
*बच्चों !* आप स्कूल में पर्यावरण बचाने के तरीके सीख रहे हैं। पेड़ लगाना, पानी-बिजली बचाना, कचरा न फैलाना — इन्हें अपने जीवन में अपनाइए।आप विद्यालय में *अर्थ डे* मनाते हैं, प्रार्थना सभा में कितने सुंदर विचार, स्लोगन, कविता, नाटक आदि के रूप में रखते-समझाते हैं ।
यही सीख आप अपने घर में माता-पिता से साँझा करें  कि वे भी आपका साथ दें।
 *अभिभावकों* से हम यही कहना चाहेंगे कि आपका बच्चा विद्यालय में जो सीख रहा है, उसे वह आचरण में लाए —  इसकी जिम्मेदारी जितनी हमारी है ,उतनी आपकी भी  है।
हम क्या-क्या गलत कर रहे हैं?
 पॉलिथीन में सामान लाना, नल खुला छोड़ना, कागज बर्बाद करना और पटाखे जलाना।
ये छोटी लगने वाली आदतें मिलकर बड़ा संकट बन जाती हैं।
 *जो कुछ भी बच्चा देखता है, वही सीखता है।*
सुधार अभी शुरू करें। छोटे कदम, बड़ा बदलाव ला सकते हैं जैसे:
नहाने के लिए बाल्टी का प्रयोग करें।
हर जन्मदिन पर एक पौधा लगाएँ ।
कमरे से निकलते ही लाइट-पंखे बंद कीजिए।
आप थैला लेकर बाजार जाएँगे तो बच्चा भी प्लास्टिक को ‘ना’ कहेगा।
साइकिल/पैदल/सार्वजनिक वाहन चुनेंगे तो उसे भी इनके फायदे पता लगेंगे ।
रिड्यूज रीयूज और री साइकिल करें ।
  अतः उसके लिए उदाहरण बनकर उसे बदलाव के लिए प्रेरित कीजिए ।
याद रखना होगा कि हमारे छोटे कदम ही धरती की बड़ी मुस्कान हैं।
 जब घर और विद्यालय मिलकर चलेंगे, तभी पृथ्वी हरी-भरी रहेगी ।
 एक छोटी-सी अच्छी सोच और शुरूआत एक बहुत बड़ा बदलाव ला सकती है।
 तो चलिए संकल्प करते हैं कि आज से ही हम अपने घर से शुरुआत करेंगे ।
“चलो सबै मिलकर धरें ,  नेक कदम अब साथ ।
 हरी-भरी हो ये धरा, लगे पौध हर हाथ ।।”
भावना अरोड़ा
हिंदी अध्यापिका,
के.आर. मंगलम वर्ल्ड स्कूल

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